Tuesday, 8 March 2022

Break the Bias (महिला दिवस) विशेष

स्त्री वो, जो आदमी के शर्ट के टूटे बटन से लेकर टूटा हुआ आत्म विश्वास तक जोड़ दे

कभी सोचा है कि महिलाओं के लिए अलग से एक दिवस बनाने की क्यों आवश्यकता पड़ी, कई तो महिला दिवस से आंकलन महिलाओं के लिए साल में एक ही दिन आता है, इससे भी लगाते है, देखा जाए तो हर दिन महिला दिवस ही तो है, पुरुष प्रधान समाज के दिमाग में सुबह के जागने से लेकर सोने तक कोई छवि घूमती है तो महिला ही तो है बस उसके रूप अलग अलग होते है कभी मां, बहन, पत्नी, दोस्त या फिर जैसा हम मस्तिष्क में सोच लेते है । लेकिन सच्चाई में यह दिवस हमको याद दिलाता है कि हमारी सृष्टि की बागड़ोर जिसके हाथ में है उनके लिए क्यों न एक स्पेशल दिन रखा जाए और उत्सव की तरह मनाया जाए, वैसे हमारे बीच मातृ सत्तात्मक सोच रखने वाले बहुत कम लोग ही होंगे।
महिलाओं के लिए वर्तमान समाज में कोई विशेषाधिकार की आवश्यकता नहीं है लेकिन जो मूलभूत जरूरतें है उन्हें तो इस समाज द्वारा पूरा किया जाना चाहिए।
महिला उत्थान के लिए कोई स्पेशल भाषण देना मुझ पर नहीं आता लेकिन मूवी के माध्यम से जब भी महिलाओं के अधिकारों की बात रखी जाती है तो दिल करता है हर महिला इसको देखे और हर पुरुष महसूस करे।

NH 10, कहानी, पिंक, थप्पड़ जैसी मूवी हमने देखी और उनके अंदर के दर्द को महसूस भी किया, लेकिन क्या समाज की सोच में कुछ परिवर्तन हुआ है, इसका जवाब शायद ही हां मिले, थोड़ा सा हुआ होगा वो भी सिर्फ युवा वर्ग, क्योंकि ये वर्ग सक्रिय है और वो  ये सब महसूस करता है क्योंकि उन्हे ये महसूस करवाने और बहस करने के लिए लड़कियों का एक वर्ग मौजूद है, ऐसा हमसे पहले वाली पीढ़ी में नहीं है इसलिए उन्हें समझाना आज भी उतना ही चुनौती पूर्ण है और उनके साथ महिला वर्ग भी है।
कुछ मुद्दे ऐसे भी होते है जिन्हें उठाने से पहले हम सोच लेते है कि दुनिया क्या कहेगी जैसे हमने PADMAN मूवी में देखा था और जब वो मुद्दा सार्वजनिक बहस का मुद्दा बन जाता है तो हम उसका समर्थन करने लगते है।

कुछ मूवी है जिन्हें पुरुष वर्ग को गौर से देखना चाहिए और सोचना चाहिए कि ये मूवी क्यों बनाई गई, जैसे ,
Dolly Kitty Aur Woh Chamkte Sitare, Is Love Enough?Sir, rat akeli hai, जब हम इन्हें देखेंगे तो  सोचेंगे की शायद इसके लिए हम ही जिम्मेदार है और सच में हम ही है। महिला वर्ग भी देखें तो शायद उनकी चेतना में भी जागृति आयेगी कि ये मुद्दे भी समाज के सामने रखे जाने चाहिए,
हॉरर मूवी के माध्यम से भी कभी कभी समाज को संदेश दिया जाता है मैंने कुछ दिन पूर्व ही Bulbbul & Chhorii मूवी देखी, हो सके तो जरूर देखना थोड़ी सी डरावनी जरूर है लेकिन इनके पीछे दर्द को महसूस करना। बुलबुल हमको स्त्री का स्त्री होना बतलाती है वही छोरी मूवी में पुरानी प्रथा के समर्थन में कैसे महिला ही महिला के उत्थान में बाधक बन जाती है ये दिखलाया है।
अब महिला या पुरुष के सोचने का विषय नही रहा, अब सोचना चाहिए कि समाज के दकियानूसी नियम जो वर्षों पहले पुरुष प्रधान समाज ने अपनी लंगोट बचाने के लिए बनाए थे उन्हें हटाने के लिए महिलाओं से पहले पुरुष को ही पहल करनी चाहिए।
समाज के नियम सामाजिक उत्थान के लिए बनाए जाते है लेकिन उनकी एक वैलिडिटी होती है जब समाज के नियम समाज में उत्थान की बजाय पतन का काम करने लगे तो समझ लेना चाहिए इन्हें बदलने का वक्त आ गया है लेकिन हम विरोध करने वाले को दबाने वाली श्रेणी के लोग है इसलिए सबसे पहले हमको खुद की गिरेबां में झांक कर देखना चाहिए ताकि समाज में बदलाब का हिस्सा बन सके।
कोई किसी से कम नहीं, सबको समानता जैसे मुहावरे समाज के मुख्य भाग होने चाहिए, अगर हम समाज की विकृत सोच को बदल पाए तो सही मायने में महिला दिवस वही होगा। 
                              जय हिंद।

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